26 मई 2015

क्या कभी ?

क्या कभी इंसान,
माप सकेगा एक बच्चे के, 
होंठों की मुस्कान ?

पहुँच चुका है इंसान,
चाँद , मंगल और गगन अविराम,
पर क्या कभी पहुंचेगा,
सच की गहराई में उसका विमान ?

बना रहे हैं आज हम ,
ऊँची -ऊँची ईमारतें,
बाँध रहें हैं दरिया का प्रवाह।

पर कब बांधेंगे हम,
समाज की खोखली जड़ों का प्रभाव ?
क्या कभी दुनिया पुनः ,
बनेगी सुख का परिणाम ?




20 मई 2015

भोर का तारा



भोर का तारा,
झांकें बादलों से संसार सारा। 
कहीं उसे दिखे,
सुख की अभिलाषा,
और कहीं दुःख की भाषा।

स्वयं उसका मन भी,
संताप से है परिपूर्ण,
चूर -चूर  है,
उसका अस्तित्व संपूर्ण। 


बादलों में छुपा है इक ओर,
टूट रही है उसके सपनों की डोर। 
कहे भी तो क्या कहे,
और करे भी तो क्या करे। 

जैसे ही चाँद डूबे और सूरज चमके,
रह जाता है भोर का तारा छुपके। 
उसकी संवेदना कोई क्या जाने,
हालाँकि पूर्ण जगत उसको माने। 


उसकी पीड़ा की गहराइयाँ अनंत हैं ,
छूना चाहूँ मैं उस भोर के तारे को,
क्या मैं परिपक्व कर पाऊँगी उसके जीर्ण सहारे को ?

वह भोर का तारा,
जो है सबसे नयारा। 

09 अप्रैल 2015

आज मैं नि:शब्द हूँ


आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ  

भिन्न भिन्न सवाल हैं

और कई बवाल हैं  

उठ  रहा तूफ़ान है 
गिर रहा मचान है  


क्यूँ दुःख हैं जीवन में ?
क्यूँ  सुख अनजान है ?

मोह माया से परास्त क्यूँ,
यह पूरा संसार है?

दे हमें मोक्ष तू ,
और मुक्ति की कामना  

कर हमारी दूर तू, 
यह सारी  यातना  

  
आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ 

02 मार्च 2015

वसंत बहार - होली की फुहार


हर तरफ रंगों की रंगोली है,
मन में ख़ुशी की लहर,
और दिल में प्रसन्नता की डोली है। 

प्रकृति के असंख्य रंग,
खिलें हैं हर्ष के संग,
और उड़ रहा है मन हवा के संग। 

पंछियों का कोलाहल,
एक मधुर राग है,
चहुँ ओर छाया रंग है,चाहे आकाश हो या भूतल। 

खो जाऊं इन रंगों में, 
वसंत की फुहारों में,
कहीं झूलें, तो कहीं ठिठोली,
यही तो है खुशियों की होली। 




होली के रंग कान्हा के संग

वृन्दावन की गलियों में,
रंग- बिरंगी कलियों में,
गूंजे तुम्हारी बांसुरी,
हे! कान्हा तुम्हारे नाम की मैं बाँवरी। 

होली यह जो आई है,
रंगों की फुहार लाई है,
तेरे रंग में रंगने को, 
हे! कान्हा मन में लगन समाई है।




हर रंग में सुर तुम्हारा समाया है,
कठिन वक्त में तुमने ही तो दिया सहारा है,
होली के लाल गुलाल सा,
हे! कान्हा तेरा रूप है विशाल सा। 

आज रंग जाऊंगी रंगो में,
छनकती हुई तरंगो में,
हर बुराई मिट जाएगी,
हे! कान्हा यह दुनिया तेरे रंग में निखर जाएगी।  
 

16 फ़रवरी 2015

जय महाकाल


कैलाश के विहारी ,
समग्र दुनिया तुमको प्यारी,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम ही देते अनाम को नाम। 

सर्पमाला से सुसज्जित,
करते सब का हित,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम में समाये चारों धाम। 

चन्द्रमा को मान दिया,
ललाट पर स्थान दिया,
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
तुम में समाये चारों धाम। 

हस्त में त्रिशूल है,
तुझ में सभी मंत्रो का  मूल है, 
तुझे कोटि - कोटि प्रणाम,
जग में केवल सच्चा है शिव का नाम । 

11 फ़रवरी 2015

क्या हो तुम

अधरों पर छनकते स्वरों की लय,
हो तुम।

आँखों में बसे स्नेहिल स्वपन,
हो तुम।

निहारे जिसे  दर्पण एक टक वह मूरत ,
हो तुम। 

आकाश में उड़ती भावनाओं की डोर ,
हो तुम।

सुदूर दिशाओं में गूंजता पर्वतीय गीत ,
हो तुम।

मन में छिपी रहस्यमयी प्रीत ,
हो तुम।

लहरों पर उमड़ता सूर्य प्रकाश ,
हो तुम।

अचल , सम्पूर्ण  प्रशांत ,
हो तुम।

शांत हो ,
एकांत हो।

क्या व्याख्यान करूँ ,
क्या वर्णन करूँ ,
सरल हो ,
अविरल हो ,
फिर भी एक पहेली।

कभी भी शायद तुम्हें बता न सकूँ ,
कि मेरे लिए क्या हो तुम...............