23 सितंबर 2025

मरु भूमि का श्राप

उत्पन्न हुआ था दूर कहीं मरु भूमि का श्राप,

अत्याचारी,व्यभिचारी मनुष्यों का एक पाप।

संचित कई असत्य वचनों और अन्यायों का संताप,

अंधकार की ओर ले जाए ऐसा श्रापित विलाप।

धैर्यहीन, संवेदनाहीन कृत्यों का सूत्रधार,

अमानवीय छल-कपट से परिपूर्ण आधार।

समग्र संसार ग्रसित, कुंठित, कर रहा हाहाकार,

सहन नहीं कर सकते अब ओर यह अभिशाप।

मुक्ति मिले, शीघ्र ही जग में सभी को,

प्रज्वलित हो धर्म की लौ,

 हो जाए सम्पूर्ण समाप्त,

मरु भूमि का श्राप ।

 


 

18 नवंबर 2023

नतमस्तक प्रणाम

 गर्व है अपने पूर्वजों पर
उनके धर्म रक्षण पर
 
सनातन से विमुख हुए नहीं जो
किसी ओर संप्रदाय के हुए नहीं जो

किया नहीं स्वधर्म त्याग
संजो रखे धार्मिक संस्कार

चाहे झेली कितनी विपत्ति
आस्था अडिग रही सनातन प्रति

छिन्न-भिन्न होने न दिया अपना धर्म-सम्मान
                                                                                            ऐसे पूर्वजों को कोटि- कोटि नतमस्तक प्रणाम II




17 नवंबर 2023

श्री राम-रक्त

कभी जो जपते थे राम -नाम
आज मानते हैं किसी ओर को
अपना भगवान

भारत-भूमि को सहना पड़ा कितना कुछ
इसके मूल धर्म को परिवर्तित कर
बना दिया ओर कुछ
परन्तु यह सदैव स्मरण रखना
भारतवर्ष के मूल निवासी
होंगे सदा ही भारतीय

चाहे किसी को भी मानो अपना ईश्वर
करो अपनी प्रार्थना व्यक्त
परन्तु तुम्हारी धमनियों में प्रवाह होगा
केवल श्री राम-रक्त

 जय श्री राम।

11 नवंबर 2023

शुभ – दीपावली

प्रज्वलित दीपों का उत्सव
रात्रि की कालिमा मिटाता सर्वस्व

टिमटिमाते दीपों की श्रृंखला
अद्भुत दमकती कला

दीपों का यह अनोखा त्यौहार
चमकाये घर और किवाड़


हर्षित है चित्त पुलकित है ह्रदय
शीश नवायें सविनय
स्वागत है भगवान श्री राम और माँ सिया का
हमारे आँगन घर- परिवार

17 अगस्त 2021

जीवन प्रवाह

नदी की धारा बहती,
उन्मुक्त,
पंछी,तितलियाँ,भँवरें,
 उड़े भय-मुक्त। 

सागर लहराता मचल-मचल, 
है हिमालय स्थिर,
अविचल। 

समस्त जीवन प्रवाह बहे,
अविरत,
 क्योंकि उन्हें है,
विश्वास प्रभु पर।

ll "ओम् तत् सत्,ओम् तत् सत्" ll 

16 अगस्त 2021

कुछ प्रश्न

क्या कभी मेरे हृदय की पीड़ा,
तुम समझ पाओगे?
और यदि समझ गए तो,
क्या उसे पुष्प की तरह सहलाओगे?
 
            मेरे अन्तःमन की वेदना,
            क्या तुम पढ़ सकते हो
            और यदि पढ़ सके तो,
            इसे कोई मधुर गीत सुनाओगे?
 
क्या इस कोलाहल के,
तुम तक तार पहुंचते हैं?
और यदि पहुंच गए तो,
क्या प्रशांत बन,उसको शांत करवाओगे ?
 
           यही कुछ प्रश्न हैं मेरे,
           क्या इनका उत्तर,
           तुम मुझको दे पाओगे? 

15 अगस्त 2021

गूंजने दो विजयी नारा

उठा लो हाथ में ध्वजा,
है पूरा भारतवर्ष सजा  । 

गूंजने दो विजयी नारा,
आज है पर्व हमारा। 

न जाने कितना लहू बहा,
कितना कुछ सभी ने सहा। 

आज हम स्वतंत्र हैं,
पर मन में कई प्रश्न हैं। 

है यही आशा आज की,
भ्रष्टाचार,जातिवाद,
धर्म पर अपवाद,
सब हो जाएं समाप्त यह विवाद। 


09 अगस्त 2021

हे! भोले अब ना आना

कण -कण छलकती मिट्टी माटी,
उड़ती बयार संग रेत मरुस्थल की,
आंधी तूफ़ान बहते पल - पल,
पिघलता मद्धम - मद्धम हिमनद,
और उफनता समुद्र थर - थर।

यह खनक जलवायु परिवर्तन से ,
ज्यों हलाहल छलके, बूँद बूँद बर्तन से।

हे! भोले अब ना आना,
इस हलाहल को न समाना,
मनुष्य को अब न बचाना,
भस्म हो जाने दो मनुष्य जाती को,
इस  हलाहल की अग्नि में।  

28 जुलाई 2021

वर्षा ऋतु

पती धरती जब मांगे पानी,
वर्षा ऋतु आयी सुहानी।

झन - झन करते जल के मोती,
खन्न- खन्न बहते नदियां नाले,
बादलों का महल निराला,
उड़ेले जल का बहता प्याला।

वन- उपवन सब महके-महके,
चिड़ियाँ , बुलबुल सब चहकें चहकें,
नीर ही है जीवन दाता,
सावन का  मौसम सबको सुहाता।





05 जून 2021

काँच का मोती

मैं काँच का मोती हूं,

तपा हूं चाहे अग्नि में,

पर कोमल मेरी काया है I

 

मुझे सहेज रखना हथेली पर,

गिरा तो छिन्न-भिन्न हो जाऊंगा,

टुकड़े मेरे कण जैसे, कभी जोड़ नहीं पाओगेI

 

 मैं तुम में ही समाया हूं,

तुम्हारे वचनों में ,तुम्हारे शब्दों में,

तुम्हारे भावों  में जड़ा हुआ, मैं कांच का मोती हूं I

 

एक बार जो फिसला हाथ से,

तो रोक ना मुझको पाओगे,

यदि सत्य वचन जड़ा हुआ,

तो तारों सा आकाश में जगमगाता हुआ मुझे पाओगेI

यदि असत्य जड़ा हुआ,

तो किसी हृदय की पीड़ा बन जीवन भर दुख पाओगेI

 

हां, मैं काँच का मोती हूं,

तुम्हारे मन में समाया हुआ

आंच  में तपा , अग्नि में जला I

04 मार्च 2021

बस यूँ ही

अचानक यूँ चलते चलते इन सूनी राहों पर

लगा, कि शायद तुम मिल जाओ, 

न कोई सवाल, न कोई जवाब, 

            बस यूँ ही मुझे तुम मिल जाओ । 


तुम्हारे पैरों की छाप उन सूनी राहों  पर,

शायद, बता दे तुम्हारा पता,

न कुछ कहना, न कुछ सुनना,

बस यूँ ही मुझे तुम मिल जाना। 

             

 कभी उस राह पर, मेरी ओर आओ तो,

 अपने होने का ही सही,

 एक मीठा सा अहसास, मुझे दे जाना,

 बस यूँ ही मुझे तुम मिल जाना।